अपनी मातृभूमि की रक्षा और बलिदान का पाठ पढ़ता है हल्दीघाटी का युद्ध: इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है आज का दिन 

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आज के दिन के बारें में अगर किसी से पुछा जाएं तो वह सिर्फ यही बताएगा कि आज भारत और पाकिस्तान के बीच चैंपियंस ट्रॉफी का फाइनल होने वाला है या फिर अपने किसी दोस्त के बर्थ डे के बारें में। वैसे इन आधुनिक और विलासितापूर्ण जिंदगी में लोग अपने अतीत अपने इतिहास को भूलते जा रहें है। अगर आपको याद नहीं तो हम आपको बता दें कि आज के दिन ही त्याग और बलिदान की कर्मभूमि मेवाड में 15 जून 1576 ईस्वी में महाराणा प्रताप और अकबर की सेना की बीच हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा गया था।

आज के दिन ही लड़ा गया था युद्ध

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी को मेवाड तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। जहां एक और अकबर की ओर से एकमात्र राजपूत सेनानायक आमेर के कुंवर मानसिंह थे तो वहीं दूसरी और महाराणा प्रताप की तरफ से लडने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे हकीम खाँ सूरी।

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मुट्ठी भर सेना ने मचाया कोहराम

इस ऐतिहासिक युद्ध में जहां मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए थे, लेकिन फिर भी मात्र मुट्ठी भर सैनिक होते हुए भी उन्होने मुगल सेना को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया था। इस युद्ध में एक और वीर सैनिक था जिन्होने ना सिर्फ युद्ध में अपना पराक्रम दिखाया बल्कि महाराणा प्रताप को संकट में पडता देखकर अपने प्राणो का भी बलिदान दिया।

महारणा प्रताप की जान बचाते हुए गवाएं अपने प्राण

हम बात कर रहें है बड़ी सादड़ी के झाला मान की। हल्दीघाटी युद्ध के दौरान जब महाराणा प्रताप सख्त जख्मी हो गए, तब झाला मान महाराणा के छत्र-चँवर वगैरह धारण कर बड़ी बहादुरी से लड़े और वीरगति को प्राप्त हुए। महाराणा प्रताप घायल अवस्था में एक मूर्ति के पास आकर रुके, ये मूर्ति भगवान हरिहर की थी। इसी स्थान पर महाराणा को सूचना मिली की झाला मान वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं, तब महाराणा प्रताप ने उस जगह का नाम झाला मान/झाला बींदा की याद में बिदराणा रख दिया, जो कालान्तर में बदराणा हो गया।

बलिदानों की भूमि है भारत

देश ने समय-समय पर कई वीर योद्धा दिए है जिन्होने ना सिर्फ अपनी आन-बान और शान बल्कि अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणो की भी आहूति दे दी। इन्ही में एक थे झाला मान। हल्दीघाटी का युद्ध ना सिर्फ एक युद्ध था बल्कि इतिहास का ऐसा युद्ध था, जिसने राजस्थान के साथ-साथ सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान की भी परवाह ना करने का पाठ पढ़ाया।

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