ऑपरेशन ब्लूस्टार- आजाद भारत के इतिहास की सबसे बड़ी खूनी लड़ाई, 34वीं बरसी आज

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आज से 34 वर्ष पहले पंजाब में एक ऐसा सेना का आॅपरेशन शुरू हुआ जिसने देश की राजनीतिक और समुदाय के समीकरण को ही बदल दिया। इस सैन्य आॅपरेशन का खामियाजा पूरे देश को भुगतना पडा। हम बात कर रहें है ऑपरेशन ब्लू स्टार की। खालिस्तान का सपना देखने वाले सिख समुदाय के लोग आज भी इस ऑपरेशन को भूले नहीं हैं। वही देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी इस आॅपरेशन के बदले का शिकार होना पड़ा।

 क्या था ऑपरेशन ब्लूस्टार ?

कहने को तो ऑपरेशन ब्लू स्टार 3 जून 1984 से 6 जून 1984 के बीच चला था, लेकिन इसकी चिंगारी तो 1970 के दशक में सुलग चुकी थी। 2 जून 1984 को मंदिर साहिब परिसर में हज़ारों श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था क्योकि तीन जून को गुरू अर्जुन देव का शहीदी दिवस था। इसमें खालिस्तान का सपना देखने वाले जरनैल सिंह भिंडरावाला  और उसकी छोटी-सी टुकड़ी भी हथियारों के साथ शामिल थी। अमृतसर स्थि‍त स्वर्ण मंदिर के पास अपने हथियारबंद साथियों के घेरे में छिपे बैठे भिंडरावाले और उसकी छोटी-सी टुकड़ी को काबू करने के लिए सेना ने अभि‍यान चलाया, इसे ऑपरेशन ब्लू स्टार का नाम दिया गया। हालांकि पहले इस अभि‍यान का नाम ऑपरेशन सनडाउन था। क्योंकि सारी कार्रवाई आधी रात के बाद होनी थी।

सरकार ने पंजाब की सारी सेवाएं कर दी थी बंद

3 जून 1984 को भारतीय सेना ने अमृतसर पहुँचकर स्वर्ण मंदिर परिसर को घेर लिया। शाम में शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया। इस बीच समर्थको के साथ सेना की झड़प हुई। वहीं सरकार ने पंजाब से आने-जाने वाली रेलगाड़ियों और बस सेवाओं पर रोक लगा दी, फ़ोन कनेक्शन काट दिए गए और विदेशी मीडिया को राज्य से बाहर कर दिया गया।

दोनो और से गोलीबारी शुरू

4 जून 1984 को मंदिर परिसर में श्रृद्धालुओं समेत तकरीबन पांच हजार लोग जमा हो चुके थे। तड़के लगभग चार बजे अकाल तख़्त के पास सिंधियों की धर्मशाला पर बम से हमला किया गया। इसके बाद सेना ने गोलीबारी शुरु कर दी ताकि मंदिर में मौजूद मोर्चाबंद चरमपंथियों के हथियारों और असले का अंदाज़ा लगाया जा सके।

किया टैंकों को इस्तेमाल

5 जून 1984 तक चरमपंथियों की ओर से गोलीबारी इतनी ज्यादा बढ चुकी थी कि सेना ने बख़तरबंद गाड़ियों और टैंकों को इस्तेमाल करने का निर्णय किया। इसी रात सेना और सिख लड़ाकों के बीच असली भिड़ंत शुरु हुई। चश्मदीदों के मुताबिक, सेना के चार टैंक मौजूद थे जिनमें से एक टैंक पर सिख लड़ाकों ने रॉकेट से हमला किया। पूरी रात दोनो और से फायरिंग होती रही।

जरनैल सिंह भिंडरांवाले और उसके साथी मारें गए

06 जून 1984 की सुबह आठ बजे तक सेना पूरी तरह स्वर्ण मंदिर परिसर में दाख़िल हो गई थी। इसके बाद सेना ने परिसर के हर कमरे में बम फेंके और वहां मौजूद लोगो को बाहर निकालने की कोशिश की। इस कार्यवाही में चरमपंथियों सहित कई निर्दोष भी मारे गए। तख़्त में जरनैल सिंह के साथ सेवादार हेड ग्रंथी प्रीतम सिंह समेत लगभग 40 लोग थे जिनका सेना के साथ सीधा टकराव हुआ। जिसमें जरनैल सिंह भिंडरांवाले, उसके सभी सहयोगी मारे गए। शाम पांच बजे तक गोलाबारी पूरी तरह बंद हो गई थी।

 

ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत इंदिरा गांधी की मौत

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इस आॅपरेशन के बाद लगभग 200 सिख लडाको ने समर्पण किया था। इस आॅपरेशन में 492 लोगों की जान गईण् जिसमें सेना के चार अफसरों सहित 83 जवान शहीद हुए थे। एक निजी रिपोर्ट के अनुसार ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान 5000 से अधिक लोग मारे गए थे।

ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत इंदिरा गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पडी। इस आॅपरेशन के 4 महीने बाद 31 अक्टूबर को दो सिख अंगरक्षकों ने इंदिरा गांधी को गोली मार दी।

ऑपरेशन ब्लू स्टार का विडियो देखने के लिए क्लिक करें

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